Friday, 6 July 2018

आवारा पागल इश्क़

‌होता तो है पागलपन इश्क़ में
और होती आवारगी भी है
एक पागलपन आशिक़ी में हो
ये बदस्तूर होता चला आया है
और मान भी लिया है सबने
और ये होता हर प्यार में है।
आवारगी ऐसी कि
हँसी उबासी बन
दूर दूर दो होठो को
एक संग मुस्का दे
रोंगटे खड़े हो जाए
ऐसा एहसास जगा दे ।
फिर वो हँसी
चाल ढाल की भी
मोहताज हो जाती है
इश्क़ करने की ज़िन्दगी में।
जो कही वो जाने बाबत
उठा देता है सर
ये पागलपन
अंदर समाये इश्क़ में
खुद को महफूज़ पा लेता है
वो उसका साथ छोड़
अपने अंदर अपने इश्क़ की
दुनिया बस लेता है।
ताउम्र एक हसीन ख्वाब संजोये
यादो में शत प्रतिशत
अपनी मोहब्बत पा
उसमे एक आवारगी खोज लेता है।
इश्क़ पागल आवारा सब होता है
नासमझ बईमान झूठा
बदमाश नादान ज़िद्दी भी होता है।
इश्क़ दर्द हँसी याद आंसू का दोस्त होता है
वो सिर्फ 'उससे' ही नही
'तुमसे' भी हुआ है
ये इश्क़ आखों की इजाज़त का
गर्दन की हामी का
होठो के सलीको का मोहताज नही होता
बेशक ये आवारा और पागल ज़रूर होता है।


Monday, 18 June 2018

मैं लिखूँगी...

मैं लिखूंगी
लिखूँगी उस दम तक
जब तक मेरी कलम
एक आंसू न बन जाये
न बन जाये वो तलवार
जिसकी ज़रूरत है
बरसो पुरानी ज़ंज़ीर तोड़ने को
एक सैलाब
जो बहा ले जाये
सबके रंज ओ ग़म
न बन जाये एक रास्ता
जो खोल दे सब रास्ते
आने जाने को उस पार से इस पार
लिखूँगी तब तक
जब तक मैं ना बन जाऊं
तेरे होने का एक हिस्सा
हिस्सा जिसमें आत्म सम्मान हो
छोड़ती हूँ इस कविता को अधूरा
अधूरी तब तक
जब तक इसे अपनी आवाज़ न मिल जाए
लिखती रहूँगी मैं
फिर तुम, कोई और
सिलसिला चलता रहेगा
कलम को आवाज़
आवाज़ को लाठी
लाठी को कारतूस
कारतूस को टैंक
टैंक को परमाणु
और फिर परमाणु को कलम का आगाज़ न हो जाये।
मैं लिखती रहूँगी
लिखूँगी तुमको भी
जो कहना चाहती हूं
ज़ुबान नही कलम की सुनोगे तुम
शायद अकेले में
थोड़े अँधियारे थोड़े सवेरे में
उस धुंधले में
जहां आईना चेहरे को
रूह जिस्म को धुंधला दिखलाता है
वहां तुम मुझसे चुप्पी वाली हां साझा कर पाओ
तुम्हारी वो छुपी हाँ
कलम की स्याही से बनी बनावट में छुपे भावना को आकार देने का पहला प्रयास होंगे
और वो धुंधलाई तुम्हारी रूह
मेरे शब्दों के दुनयावी संवादों का अनुवाद होगी।
मैं तब तक लिखती रहूँगी
और उसके बाद भी।

Thursday, 10 May 2018

क्या मैं तुमसे प्यार कर सकती हूं?

क्या मैं तुमसे प्यार कर सकती हूं?
ऐसे निगाहों से अटपटे सवाल न पूछो
किया है मैने प्रेम तुमसे
मैने आंखों में हसरत संजोयी है
कि मैं तुम्हारे सिर को
अपनी गोद में लेकर बैठी रहू
बिता दूँ सारे पहर
गोद...हाँ गोद
जांघ भी आया जेहन में लिखने को
पर इस शब्द की मादकता
मेरे नवजात इश्क़ को आवारा न बना दे
शब्दो का भी ग़ज़ब खेल है
 इस मोहब्त की शतरंज में।
हाँ तो, शब्दों के चक्कर मे नया प्यार क्यों ही पडे,
अभी तो गुज़ारिश हो रही है
क्या मैं तुम्हे प्यार कर सकती हूँ?
कि तुम्हारे बालों में उँगलियाँ फेरते बीत जाए लम्हे
सारी थकान निचोड़ फेंक इत्मिनान भर दूँ तुझमे
काँधे पे सिर टिका
एहसास हो बस तेरा
न तू कुछ माँगे
न मेरी कोई जिरह हो
जो है दे दे अपना सब
उसमे न कोई कमी हो
गर है कोई उलझन
तो उसका पता खो जाने दे उस पल
हद बेहद न हो पाए
तो, हद की इज़्ज़त भी न ताके उस पल
तू कोई सवाल न पूछे
मैं कोई हिसाब न मांगू
पर पूरे होने की ख्वाहिश
बेमानी वसूली सी न लगे एक पल
कल के बीते और आने की
ख़बर थम जाए चौरस्ते पे
रस्ता न भी भूले
तो, दस्तक देर से दे जाए उस पल।
तो, क्या मैं तुमसे प्यार कर सकती हूं?
ये सवाल तुमसे नही
खुद से है मेरा।

झूठी फरेब चोर हूँ मैं
दबे पांव आ के, तुझ संग जी के
बिना इत्तला किये तुझे
खैरमकदम कर
बीते पल का इतिहास मिटा देना चाहती हूं
तेरे और अपने सवालो से
मुह चुरा लेना चाहती हूं
सवाल तो उठेंगे ही
वाजिब औ ख़यालात से ताल्लुकात रखे
इसलिए
मन ही मन तुम्हे प्यार कर लेना चाहती हूं।
डर, पाबंदी खराश खांसी से है
हिचकी औ च्च्च भी है रस्ता रोके मेरा
तुमसे पहले मुझे मेरा जवाब सुन्ना है
क्या मैं तुम्हे प्यार कर सकती हूं?







Tuesday, 20 March 2018

धक्का खाते इतिहास का वर्तमान

ये कविता आज कल 'धक्कामार प्रतिमा गिराओ आंदोनल' की खबरों से उपजी है। इसमें ज़िक्र है पूर्णिया के अजीत सरकार का जो 15 साल लोगों की सेवा ऐसे किये कि उनकी कमी आज भी लोगों के आंखों से आंसू छलका देती है और उनका कातिल बाइज़्ज़त बरी हो नया इतिहास रचता है। और ज़िक्र है महात्मा गांधी और इंदिरा गांधी का। इन्होंने एक इतिहास लिखा और अब आज का युवा जो हुजूम मात्र रह गया है, एक भीड़, जो आये दिन किसी भावनात्मक भाषा का शिकार हो किसी दम्भ में प्रतिमाओ को तोड़ते है। इससे क्या हासिल होगा या होता है ये शायद उनको भी नही पता।
 ये कुछ नामों का ज़िक्र चिन्हात्मक है। वैसे अम्बेडकर, लेनिन और न जाने कौन कौन कुछ मृत कुछ ज़िंदा (कलबुर्गी, नरेंद्र दाभोलकर, गौरी लंकेश आदि) इनका शिकार बनते रहते है।


एक सौ सात गोली खा के,
दायीं तरफ लटका पड़ा
'सरकार' का मृत शरीर,
हाथों में नालीनुमा रस्ते से, 
खून ज़मीं पे नदी बना, 
अपने नए अस्तित्व की खोज में 
बेजान ही नयी मंज़िल तलाश रहे थे,
एक सौ सात कारतूसों की 
गड़गड़ाहट से जो शोर था 
चिड़ियों ने भी उस शांति में
शोक नाद किया,
एक चपल पंखधारी भूरी सी 
उड़ बैठी बगल में,
खोपड़ी के अधखुले नसों को 
सिर टेढ़ा कर के देखती 
उसने किसी को आवाज़ न दिया।

कभी ऐसे ही किसी ने अपना गुस्सा
अपनी तकलीफ की आग को 
पानी की बौछार खातिर 
एक लाठी को तोड़ 
बन्दूक की गोली से 
'हे राम' में विलीन किया 
तो कभी सिरमौर का उफान 
और वचन निभाने खातिर,
साडी में लौह ह्रदय शिथिल सा हुआ 
मूर्तियों में समापन हो जाते है 
कुछ दिनों में फूलमाला आरती
विज्ञापन और ज्ञापन हो जाते है

कई अरसे सदियों बाद
एक नयी विचारधारा फिर
 रुकी हुई सांसों टूटी हुई लाठी
अधखुले सिर से रिस्ते हुए खून की याद में
पांच फिट ऊँची बानी
प्रमाणिक माटी की अप्रमाणिक सी प्रतिमा को
फिर से अपने क्रोध की आग
बदले के ज़हर को
कदाचित शांत करने
उठा धकेल देते है,
टूटी लाठी फिर से तोड़ देते है।

अब क्या होगा ?
 क्या फिर से खून बह निकलेगा
हे राम कराह उठेगा
या लौह महिला परुषार्थ को उठा झकझोर खड़ा कर देगी
या फिर वो आग शांत हो जाएगी।
या फिर यूँ ही कुछ चेहरे
हर सदी बनते रहेंगे
जिन्हें तुम असंख्य की तादाद में आ कर तोड़ सको
क्युकी तुम्हे इस लोकतंत्र ने
लाठी उठा के चलने का इतिहास दिया है
कोई लाठी लेकर लोकतंत्र ले आया
तुम उसी लाठी को धक्का दे
इतिहास की बैसाखी पे टिका प्रजातंत्र तोड़ सकते हो।







Tuesday, 26 December 2017

जब लफ्ज़ न बयां कर पाए
उस लम्हे में मोहब्बत की है,
वादा करने से कतराता हूँ
वादाखिलाफी से बगावत की है,
जुदाई में बेवफाई का रोष नहीं
इसलिए जाते वक़्त रुस्वाई नहीं की है। 

Monday, 25 December 2017

'तुम दोनों'

मेरे होने से तुम्हे कुछ शिकायत है क्या
अब बात में कोई जिरह नहीं होती   
मैं हाल पूछती हूँ, तुम खबर पूछते हो
अब मिलने की गुजारिश नहीं होती
तुमसे बात से पहले दिल टटोलता है खुद को
कई दफे गहरी सांस लेता है
जैसे पूछता हो अंदर ही
कि संभाल लोगे न?
ये गहरी साँसे पहले भी होती थी
पर मुस्कान और गुफ्तगू के लिए,
अब तो कोई जवाब ही नहीं होता।
कुछ सवाल में सवाल जुड़ जाते है
कहने को जवाब मिल जाते है
ऐसी बातें करने में भी
शायद किसी रिश्ते ने  सिफारिश लगाई होगी।
वरना आजकल तो पहले की तरह
उंगलियां नहीं थिरकती मेरे नाम पर।

एक काम करते है....
जब मैं पहली बार मिली थी
तो तुम खुश थे
तो चलो फिर से अजनबी  बन जाते है
ये मजबूरी नहीं भाती मुझे
तुमसे फिर से मिलना चाहती हूँ
फिर से उन्ही बाहों में लिपट के
सो जाना चाहती हूँ।
और तुमसे जैसे पिछली बार
साल की आखिरी रात को मिली थी
वैसे ही मिलना चाहती हूँ।
बिना सोचे कि तुम थके होंगे
तुम्हारे हाथो की थकान से अनजान
पूरी रात वैसे ही लिपटना चाहती हूँ।
दाढ़ी के बालों से चिढ के
अपना हाथ तुम्हरे सीने से रगड़ना चाहती हूँ
तुम्हरी थाली में ही आधा तिहाई खाना खा के
कही तो बाहर भाग जाना चाहती हूँ
तुमसे डाट खा के
तुम्हारे ही पेट पे सोना चाहती हूँ
उन नाखूनों, सर के बालों की रुसी,
पैसों के लिए अलग से हम दोनों का हिसाब
उधारी और वापस कर देने का वादा
मेरी पढाई का कुछ पता न होना
मेरे रिजल्ट पे खूब खुश होना
मुझे अकेले ज़माने से जीतने को छोड़ देना
मेरे हारने पे बस चुप रह जाना
मेरे फिर से उठने पे मुझे जाने देना
मैं फिर से बिना कुछ सोचे
वही 'गम्मू' होना चाहती हूँ।

ये जो मेरा 'तुम' हो
वो तुम दोनों हो
ऊपर लिखा सब तुम दोनों हो
दोनों ही मुझे एक दूजे के लिए
छोड़ रहे है, छोड़  नहीं भी रहे है।
तुम दोनों चाहते हो
मैं एक को छोड़ दूजे के साथ चल पडूँ।
पर जब पिछली बार
तुम्हे छुआ तो
ढलती उमर की लचक और कमज़ोरी दिखाई दी
आँखों में मुझसे उम्मीदें दिखाई दी
 तो लगा कि तुम अब वो नहीं
मुझे 'मैं'  से अब 'तुम' बनना पड़ेगा
अपने कंधे को मजबूत बना
उन पर तुमको आराम देना होगा
और तुम जो अब भी जवान हो
बस साथ देना मेरा
पर तुम दोनों खफा से हो
मैं तुम दोनों के जानिब हर कदम आगे बढ़ रही हूँ
मुझसे मेरा हाथ मांगो
पर इसे काटो नहीं
वरना कही मेरा कन्धा टूट जायेगा
कही मेरी मेरुदंड झुक जाएगी
बहुत काम बाकी है
अपाहिज हो काम करना मुश्किल हो जायेगा।
सीखा तुमसे है ज़िन्दगी के कई फलसफे
बिना तुम्हारे  इस कविता का शीर्षक
बनाम हो जायेगा।






Friday, 17 November 2017

ये बात है, तकरार नहीं

तुम मुझे माटी समझ रौंदों
ये तुम्हारा फ़र्ज़ होगा। 
मिट्टी की उड़ान को 
सुबह-ओ-शाम पानी डाल 
ज़मीं के सीने में सुला देना 
इससे भी ख़फ़ा नहीं,
ये तुम करोगे ही। 
मैं तो वो घास हूँ 
जो हर सतह पर उग आएगी 
तुम्हारे चाहे अनचाहे,
तुम बिना काम का समझ 
उखाड़ फेंकना,
या सुन्दर कलाकारी जो मेरे साथ जन्मी है 
उसे तराश घर आँगन सजाओ,
ये भी तुम्हारा फ़र्ज़ है। 
तुम ये करोगे भी 
क्युकी तुमने यही सीखा है 
और ज़िम्मेदारी भी ली है। 
पर तुम अब चाहते हो और तगड़ी पकड़ 
तुम मुझे डामर में लपेट 
बड़ी बड़ी मशीन से 
सुन्दर सपाट बिछा देना चाहते हो। 
उस पर सफ़ेद काली पीली पट्टी बना,
'उनको' रास्ता बताना चाहते हो। 
एक स्मारक बनेगा तुम्हारा 
क्युकी तुमने अपनी मेहनत से 
मुझे एक छोटी गली से 
बड़ी पक्की मेटल रोड बनाया है। 
रोड तुम्हारे नाम की होगी 
वो सफ़ेद पट्टी मेरी सीमा 
और घुमावदार निशान 
आने वाली उड़ान की इच्छा रखे बचपन को 
तुम्हारे सधे सधाए रास्तों पर चलने का रास्ता बताएँगे।  
हाँ, तुमने ही मुझे आज़ादी दी। 
पर वो अब आज़ादी की परिभाषा में उड़ान शामिल है, 
सवाल शामिल है,
उनकी खोज की लालसा              
और उनके जवाब भी आखिर में शामिल है। 
मेरे अस्तित्व से गठबंधन है अब उसका 
और मैं ये वादा करती हूँ 
किसी पर ये आज़ादी थोपूंगी नहीं,तुम्हारी तरह। 
हिम्मत ज़रूर दूंगी 
सपने देखने की, 
जैसे तुमने मुझे दी है 
और आज भी दे रहे हो। 
पर हाँ, अगर मैं घास हूँ, तो 
'पाश' की घास से मुकाबला करना मेरा 
मैं ज़िद्दी  हूँ 
मैं हर दफे निकल आउंगी।
हरा रंग मेरा है, 
मज़हब न पूछो तो मैं हरियाली ही लाऊंगी।  


Saturday, 4 November 2017

गठबंधन

वो आज आईने के सामने खड़े हो
खुद के ,
पुतलियां घूमा,
हर कोने की तलाशी ले रही थी
जैसे जानना चाह रही हो
कि सही से तराशा है या नहीं।
आंखों के पास
अरे नाक के बाई तरफ भी
दो काले भूरे तिल
निकल आये है
उसको भाए नहीं।
हल्के से बाएं हो के
उसने बगलों को झाँका
वो थोड़ी भरी भरी दिखी
झुर्रियों को देख आंखों के किनारों पे
गाल के गड्ढो को
हस के गहरा कर दिया
और गहरा गयी झुर्रियां भी।
उसके टूट्ठी पे
बायीं तरफ एक काला मस्सा है
सुंदर लगता है
उस पर एक काला बाल निकल आया है
बिन बुलाए मुसीबत जैसा,
वो उसे हर बार दांत से काट कर
निकाल फेंकता है,
शुक्र है, वो फिर से निकल आता है।
वो ऊपर से नीचे तक खुद को
धब्बों में जकड़े सीसे में
सवांरती रही।
पलटी और फिर चली गयी
आईने को कोरा छोड़।
शाम में
कागज़ को पानी से नरम कर
उन धब्बों को
मिटा दिया रगड़ के
आईना साफ था अब
पर अब रोशनी जा रही थी
उसने हल्की रोशनी में
उंगली से छू के
आंखे सिकोड़ के देखा
वो टूट्ठी के मस्से का काला बाल
फिर से कमबख्त आ गया है
आज फिर वो दांतों से उसे निकाल फेंकेगा।
वो पिछले पांच दिन से
एक दूजे से ख़फ़ा थे
खटपट आम है उनमें
पर कमबख्त तिल का ये काला बाल
'सिर्फ काम की वजह से'
उसके होंठो और
उसकी टूट्ठी को
कई बार की तरह
फिर बाहरी गठबंधन पे
मजबूर कर दिया।









Wednesday, 25 October 2017

मैं तो 'ग्रीन सैंडल' सुनाना चाहती थी बस!

एक कहानी सुनेंगें? किसी और की ज़िदगी हमारे आपके लिए कहानी ही तो होती है। इस कहानी में एक और कहानी है। जब चाँद से ज़्यादा स्ट्रीट लाइट की रोशनी से जगमगा जाए रात तो उस रात में मोहब्बत के निशान ढूंढना थोड़ा मुश्किल जान पड़ता है। और एक हारे हुए बिना नौकरी और बिना पैसे वाले को इश्क़ हो जाए तो वो पागलपन आवारा जैसे रिश्तों तक ही रह जाता है। वो उस रात पार्क के एक कोने में बैठ आसमान में कुछ तो अपना खोया हुआ ढूंढ रही थी। अच्छा एक बात बड़ी खूब है, कभी देखियेगा कितना भी शैतान बच्चा क्यों न हो अगर ज़ोर से झल्लाहट के साथ फटकार दे तो वो भी पास नही आता। क्योंकि उसकी आस वही खत्म हो जाती है उस डांट के साथ। इस लड़की की भी आस शायद ज़मीन से खत्म थी तभी तो वो आसमान को निहार रही थी। बीच मे कुछ बुदबुदाए और इतनी मगन कि जब मैं उस बेंच पे बैठी तो मेरे होने से सिर्फ उसकी बातों में एक संकोच आया पर उसकी आंखें अब भी उतनी ही तेज़ी से कुछ खोज रही थी। कभी चाँद से शिकायत करे कभी तारों से। कभी सूरज का इन्तज़ार। मैने पूछा तो बड़ी देर बाद दोस्ती की शुरुआत ही सही उसने अनजान समझ कुछ बोल दिया। और बोली तो क्या बोली कि मुझे ' ग्रीन सैंडल' स्टोरी सुनाना था उसको बस। पर लड़ाई हो गयी। इन सब मे मेरा वो मासूम सा बचपन डर जाता है। वो गुस्से में मुझे भगा देता है खुद से दूर और मैं उससे लड़ के रह नही पाती। हमेशा उसे हक्की बक्की रह कर देखती रह जाती हुँ जब वो गुस्साता है। ये शहर मुझे अपना से कभी नही लगा। मैं समझ नही पाई वो नाराज क्यों हुआ? मुझसे ही हुआ ना? 
आंसू पोछते हुए कहा कि आप ग्रीन सैंडल सुनोग? मंटो की है। पिछले हफ्ते ही पढ़ी थी। वो सुनता तो खूब हसता और चिढाता भी। उसकी अपनी दुनिया है और मैं उससे उसका कुछ वक्त मांग बैठती हू जिसमे केवल वो और मैं रहे और क्योंकि वो कम बोलता है तो ऐज़ यूजअल मैं बोलू और वो सुने। मुझे बोलना अच्छा लगता है।
सुनाऊ? मैंने कहां हाँ। मंटो मुझे पसंद है। पर ये उसने नही पूछा मुझसे। जैसे उसने सोच लिया यह बस ये कहानी सुना देनी है। वो नही तो किसी को भी। बचा के रखना भी नही चाहती थी जैसे उम्मीद खतम करने का इरादा बना लिया हो। कुछ टूटा था जैसे। मासूमियत शायद। अजीब सी संभली और बिखरी। ऐसी भी क्या मासूमियत जो हर बार के झगड़े में बुरा मान जाए। पर शायद कुछ होते है। वो चांद को देख शायद वो सारे लम्हे वापस कर रही थी उस रात। छोटी सी तकरार रार बन रही थी। 
थोड़ा रुकी वो जैसे कहना ही न चाहती हो। खुद से पूछ रही हो कि कल वो सुनने आ गया तो। रुक जाऊं एक रात। अंदर भी एक कहानी चल रही रही थी। उम्मीद समझदारी नासमझी सपने इश्क़ हक़ीक़त और रुसवाई इन सब का मेला लग चुका था। दिल दिमाग दीवाली के पटाखों में खुद को मदहोश कर माहौल का मज़ा ले रहे थे। 
वो फिर बोली पर पता नही आपको अछि लगे या नही। आपने मंटो को पढ़ा है। मैंने मुस्कुरा के सिर हा में हिला दिया। बोली अच्छा क्या क्या पढ़ा है। कुछ वक्त इसी में बीत गया। कुछ उसने कुछ मैंने किस्से कहानियां सुनाए एक दूजे को। जगहों किताबों की खूब बात हुई। फिर बात आ रुकी जहां शुरू हुई थी - ग्रीन सैंडल। 
पता है उसने मुझे नही सुनाया उस कहानी को। बस किरदार के बारे में बात करती रही। दोनों अब जाना चाह रहे थे। मैंने थोड़ा झिझक के पूछ ही लिया क्या ग्रीन सैंडल अब भी उसके लिए बचा के रखी है? उसने ज़मीन को देखते हुए मुस्कुरा कर कहा नही। फिर आसमां को ताक कर कुछ झांक कर बोली, ये तमाम कहानीयाँ ही है मैं किसी को सुनाने में अपनी कहानी क्यों खराब करू। आप अब मेरी कहानी बताना। मंटो ने मेरे लिए लिखी थी तो पहुच गयी वो मुझ तक। बहुत है जिन तक मुझे पहचना है। मंटो ने उसके लिए लिखी ही नही थी। मैम पगली ये समझना नही चाहती। इसीलिए मंटो की कहानी में अपनी कहानी बना बैठी। 

Friday, 29 September 2017

दिल्ली में कुछ की दरगाह ही होगी ये! नइ क्या?

ना ये एक कहानी है और ना ही इसे हक़ीकत मैं कहना चाहती हूं। क्युकी ये पर्दाबंद ज़िदगी है जो जवान हो चुके बच्चो से दूर बड़े और बड़ों की नज़र से अलग वो बच्चे जीने की चाह रखते है। पर हाँ, यह रह चुकी है कई कहानियों का हिस्सा। किसी की ज़िन्दगी का सबब तो किसी की मौज की दरगाह। दरगाह! दरगाह?
ना, मैं बिल्कुल भी कोई साहित्यिक रचना करने की कोशिश में नही, जो सबको पढ़ के अच्छा लगे या पसंद आ जाये। बस समझ नही पा रही कि इसे कैसे लिखूं। पर लिखना तो है। लिखना है खुद की एक और असलियत के बारे में। जो सिर्फ उनके गलियारों से गुज़रते मेरे सामने आ खड़ी हुई। कितनी बईमान हूँ, कितनी दिखावटी और कितनी नासमझ।
मेरी उलझन और मेरा अन्तर्द्वन्द मैं आप तक उसी अलह्ड़ रूप में दिखा पाऊं जैसे वो मुझमे उछल कूद मचा रहा है तो मैं सफल मानूंगी इस लेखनी को। 


भीड़ इतनी जैसे चिल्लर का बाजार लगा हो
भीतर गलियों में,
मॉल में तो क्राउड होता है
'जेन्ट्री' वाला रश होता है।
रिक्शा गाड़ी
बड़ा बूढा
लड़का लड़की
ना ना अच्छा हाँ हाँ
रिक्शे पे जाने वाली कई
सवारी।
मसाला चाय पेंट दुकान
बैंक पुलिस सबका
इंतज़ाम
दुकानों पे चढ़ता उतरता
गट्ठर बोरा भर सामान
उसी के आगे
चांदनी चौक का मसाला खादान।

ऊपर घर भी थे
एक लम्बाई में
सब जुड़े जुड़े थे।
जैसे बनिया लाला का
परिवार अलग अलग कमरों में
एक छत में रहता हो।
पूरा का पूरा कुनबा
यही बसता हो।
क्या प्यार होगा
क्या भाईचारा होगा
इस गली में  तो
हर आने वाला दुलारा होगा।
सारी औरतें  मिल के
खिलाती होंगी
दुआएं मिल खूब लाड लड़ाती होंगी।

ये समाजशास्त्रियों को यहाँ पढ़ना चाहिये
अलग अलग मालिक
और एक छत में रहने का
हुनर सबको बताना चाहिए।

पर ध्यान दो तो ये घर अलग था
एक ही खिड़की और
घर संख्याबद्ध था।
कुछ वहां से झांक रही थी।
शाम होते होते
दुकानें बंद हो गयी,
बनिया लाला बैंक मुनीम
सब बस्ता लिए ऊपर घर न गए।
लाइट जली नीचे भी और ऊपर खिड़की में भी,
दिन में डूबी सी आँखें तेज़ सुनार हो गयी।
हंसी चीख मसालों की छींक बन गए
दिन के मज़दूर रात में शेख बन गए।

घर की औरतें वैसे ही आदमी के इंतज़ार में
बस 'बाप' नहीं किसी भी 'पडोसी' के प्यार में
कोई मन्नत ले कर आता
बड़ी दुआ में बड़ा प्रसाद चढ़ाता
और खुश हो के
या फिर और ख़ुशी की उम्मीद में
खिला सा बाहर आता।
इनमे भी बटवारा है
अमीर हर जगह मुँह मारा है
इस गली में तो
सबकी अपनी हिस्सेदरी है।

मैं डरी थी उनको देख कर
मेरे जैसी पर वो रंडी थी।
मुझे भी किसी ने कहा था
'रंडी रोना' मैंने भी सुना था।
देखना चाहती थी
वो कैसे रोती है
मुझसे अच्छा या बुरा या मेरे जैसा ही रोती  है।

वो तेज़ थीं
मज़हब की पक्की थीं
एक कॉर्पोरेट वाली की तरह
एकदम कामतोड़ औरत की तरह
खुद्दार कट्टर मज़हबी की तरह
उनको दम भर काम आता है
अपना पेट पालना आता है
पर उनका नंबर है नाम नहीं
उनका काम है ईमान नहीं।
अच्छा, स्वच्छ भारत कब आएगा
अच्छा भारत नहीं, तो स्वच्छ कब आएगा
इनका भी कोई नेता है फोटो में क्या
इनमे से कोई तो होगी
उसकी भी फोटो खिंचवा दो
गाँधी की एक आंख का चश्मा ही दे दो
दूसरी का आधा भारत
चोरी-छुपे गाहें-बगाहें
यही से गुज़रता है।

 ख़याल बहुतेरे है
आयाम किनारे भी बहुत
पर इतिहास की इन दुलारी को नीलामी का डर क्या
हम जैसे इज़्ज़त वालों की रखवालियों को
उन घर में बसती मोहब्बत की समझ क्या
मैं उस दिन डर के वापस आयी
और अब हर दिन 'अच्छे लोगों' का
मुखौटा पढ़
अपनी तरह के डरपोकों की
एक गैंग बना रही हूँ।
वहां न जाने की नसीहत का
खाका सजा रही हूँ।






Thursday, 28 September 2017

वो क्यों नही समझता?
ये कह कह के
पूरी रात रात के संग जागी।
और पूछा उससे वो क्यों नही समझता?
रात गली में अंधियारा ढूंढ ज्यूँ आंख लगाए
में फिर से पलट पूछ लूं
वो क्यों नही समझता?

वो बोली जाने दे,
चल तू मेरे संग आ
मैं तो हर रोज़ तेरे संग आती हूँ
जब तू उस संग बिस्तर पे
पड़ जाती है
दोनों एक चद्दर में
वो तेरी आँखों से नाभि तक भूगोल मापता
उसके एहसास से तू उसका इतिहास पढ़ती
जब वो बिना कहे
तेरे स्तनों पे अपना नाम करोता है
क्या वो तब तुझे समझता है?
तेरे आंसू से वो डरता है
तेरी इस रात से घबराता है
वो बहुत कमजोर है
तुझ तक वो पहुच ही नही पाता है।

इसका क्या मतलब?
क्या वो मुझे नही समझता?
मैं उसे आसमान में लिखना चाहती हूँ,
अपने होंठों से उसको सहला के
माँ का स्पर्श देना चाहती हूँ।
मैं उस संग हर दरख़्त
हर कली खिलना चाहती हूँ
मैं उससे प्यार करना चाहती हूं।
वो मुझे दुनियावी नामों में संजोता है
में उसे उस नूर तलक सजा के
खुद बाग़ी बनना चाहती हूँ।
मैं हर पहाड़ हर नदी हर पत्ती
हर झुरमुट हर शंख
एक पता लिखना चाहती हूँ।
मैं उसे अपना हर एक हिस्सा देना चाहती हूँ
पर वो मुझे पागल कहता है।
उससे न कह पाने की
उसकी नज़र में खुद की समझ न पाने की
एक कसक है मुझमे
उसके नाभि से सटे बालों से खेलते
कई बार सोचा कि
वक़्त को पैमाना बना मैं इश्क़ में डूब जाउं
वो बेख्याल किसी सजी गुड़िया में
कुछ राजनीति के एरिस्टोटल को खोजता मिला।
उसे सीधी अपनी दुनिया समझती है
मै अभी के लिए उसका हिस्सा हूँ
पर मैं अपना तख्त चाहती हूं
एक ताजमहल नही
मज़ार पे एक नज़र चाहती हूँ।
मैं उसके संग पूरी दुनिया का हर हिस्सा छूना चाहती हूं
जो उसमें समाया है
मैं सच उसके सपनो की रानी बनना चाहती हूँ।
कभी वो चाहत मुझे दिखे
कि वो तड़पता है मेरे लिए
मैं वो एहसास वो रबाब चाहती हूं।
वो मेरे लिए मेरी कोख़ से अजन्मा लाड़ है
मैं उसके लिए न जाने क्या बनना चाहती हूं
जिसे वो कभी न भूले
मैं खुद को उसकी समझ बनना चाहती हूँ।

मेरी रात सो गई
मेरे कंधे सिर टिकाये
धीरे से उसने चादर फैलाया
और मुझे भी बुला लिया अपनी बाहोँ में
वहां हम दोनों
एक चद्दर में लिपटे
एक दूसरे के हाथ को लपेटे
सो गए थे
रात भी वही सो गई थी।

दर्द

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