एक कहानी सुनेंगें? किसी और की ज़िदगी हमारे आपके लिए कहानी ही तो होती है। इस कहानी में एक और कहानी है। जब चाँद से ज़्यादा स्ट्रीट लाइट की रोशनी से जगमगा जाए रात तो उस रात में मोहब्बत के निशान ढूंढना थोड़ा मुश्किल जान पड़ता है। और एक हारे हुए बिना नौकरी और बिना पैसे वाले को इश्क़ हो जाए तो वो पागलपन आवारा जैसे रिश्तों तक ही रह जाता है। वो उस रात पार्क के एक कोने में बैठ आसमान में कुछ तो अपना खोया हुआ ढूंढ रही थी। अच्छा एक बात बड़ी खूब है, कभी देखियेगा कितना भी शैतान बच्चा क्यों न हो अगर ज़ोर से झल्लाहट के साथ फटकार दे तो वो भी पास नही आता। क्योंकि उसकी आस वही खत्म हो जाती है उस डांट के साथ। इस लड़की की भी आस शायद ज़मीन से खत्म थी तभी तो वो आसमान को निहार रही थी। बीच मे कुछ बुदबुदाए और इतनी मगन कि जब मैं उस बेंच पे बैठी तो मेरे होने से सिर्फ उसकी बातों में एक संकोच आया पर उसकी आंखें अब भी उतनी ही तेज़ी से कुछ खोज रही थी। कभी चाँद से शिकायत करे कभी तारों से। कभी सूरज का इन्तज़ार। मैने पूछा तो बड़ी देर बाद दोस्ती की शुरुआत ही सही उसने अनजान समझ कुछ बोल दिया। और बोली तो क्या बोली कि मुझे ' ग्रीन सैंडल' स्टोरी सुनाना था उसको बस। पर लड़ाई हो गयी। इन सब मे मेरा वो मासूम सा बचपन डर जाता है। वो गुस्से में मुझे भगा देता है खुद से दूर और मैं उससे लड़ के रह नही पाती। हमेशा उसे हक्की बक्की रह कर देखती रह जाती हुँ जब वो गुस्साता है। ये शहर मुझे अपना से कभी नही लगा। मैं समझ नही पाई वो नाराज क्यों हुआ? मुझसे ही हुआ ना?
आंसू पोछते हुए कहा कि आप ग्रीन सैंडल सुनोग? मंटो की है। पिछले हफ्ते ही पढ़ी थी। वो सुनता तो खूब हसता और चिढाता भी। उसकी अपनी दुनिया है और मैं उससे उसका कुछ वक्त मांग बैठती हू जिसमे केवल वो और मैं रहे और क्योंकि वो कम बोलता है तो ऐज़ यूजअल मैं बोलू और वो सुने। मुझे बोलना अच्छा लगता है।
आंसू पोछते हुए कहा कि आप ग्रीन सैंडल सुनोग? मंटो की है। पिछले हफ्ते ही पढ़ी थी। वो सुनता तो खूब हसता और चिढाता भी। उसकी अपनी दुनिया है और मैं उससे उसका कुछ वक्त मांग बैठती हू जिसमे केवल वो और मैं रहे और क्योंकि वो कम बोलता है तो ऐज़ यूजअल मैं बोलू और वो सुने। मुझे बोलना अच्छा लगता है।
सुनाऊ? मैंने कहां हाँ। मंटो मुझे पसंद है। पर ये उसने नही पूछा मुझसे। जैसे उसने सोच लिया यह बस ये कहानी सुना देनी है। वो नही तो किसी को भी। बचा के रखना भी नही चाहती थी जैसे उम्मीद खतम करने का इरादा बना लिया हो। कुछ टूटा था जैसे। मासूमियत शायद। अजीब सी संभली और बिखरी। ऐसी भी क्या मासूमियत जो हर बार के झगड़े में बुरा मान जाए। पर शायद कुछ होते है। वो चांद को देख शायद वो सारे लम्हे वापस कर रही थी उस रात। छोटी सी तकरार रार बन रही थी।
थोड़ा रुकी वो जैसे कहना ही न चाहती हो। खुद से पूछ रही हो कि कल वो सुनने आ गया तो। रुक जाऊं एक रात। अंदर भी एक कहानी चल रही रही थी। उम्मीद समझदारी नासमझी सपने इश्क़ हक़ीक़त और रुसवाई इन सब का मेला लग चुका था। दिल दिमाग दीवाली के पटाखों में खुद को मदहोश कर माहौल का मज़ा ले रहे थे।
वो फिर बोली पर पता नही आपको अछि लगे या नही। आपने मंटो को पढ़ा है। मैंने मुस्कुरा के सिर हा में हिला दिया। बोली अच्छा क्या क्या पढ़ा है। कुछ वक्त इसी में बीत गया। कुछ उसने कुछ मैंने किस्से कहानियां सुनाए एक दूजे को। जगहों किताबों की खूब बात हुई। फिर बात आ रुकी जहां शुरू हुई थी - ग्रीन सैंडल।
पता है उसने मुझे नही सुनाया उस कहानी को। बस किरदार के बारे में बात करती रही। दोनों अब जाना चाह रहे थे। मैंने थोड़ा झिझक के पूछ ही लिया क्या ग्रीन सैंडल अब भी उसके लिए बचा के रखी है? उसने ज़मीन को देखते हुए मुस्कुरा कर कहा नही। फिर आसमां को ताक कर कुछ झांक कर बोली, ये तमाम कहानीयाँ ही है मैं किसी को सुनाने में अपनी कहानी क्यों खराब करू। आप अब मेरी कहानी बताना। मंटो ने मेरे लिए लिखी थी तो पहुच गयी वो मुझ तक। बहुत है जिन तक मुझे पहचना है। मंटो ने उसके लिए लिखी ही नही थी। मैम पगली ये समझना नही चाहती। इसीलिए मंटो की कहानी में अपनी कहानी बना बैठी।
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