Monday, 1 August 2016

एक पगलिया

वो एक पागल सी लड़की थी
प्रेमी को खोजा करती थी
किसी पत्ते को उठा
कान पे लगा कर तेज़ तेज़ चिल्ला
"हेल्लो" "हेल्लो" बोला करती थी
पूछती थी....
नदियां, पेड़, पहाड़ सब कैसे है
नया शब्द सुना 'मदर नेचर'....
वो मेरी जैसी है
या मॉडर्न लेडी है
पेड़ की डाल पकडे
यहाँ वहां काले कपडे डाले
पगलिया घूमा करती है
'पगलिया' गली के बच्चे
उसे कहकर हँसते है
वो गली के पीछे
पेड़ के पास जा
रोती है
दहाड़ मार के लिपटती है
फिर गुस्से में घूरती है पलट के बेखबर दुनिया को
जो उसे देख के
सुन के
पगलिया कहती है
वो बातें करती है
कब आएगा मेरा साथी
जो नदिया को सहलायेगा
पहाड़ो को हँसाएगा
पेड़ो को संभालेगा...
खेलेगा उनके संग
संभालेगा हर ज़ज़्बात
एक पागल आया है....
बच्चे उसके पीछे पर
दूर दूर
भाग के बोल रहे थे
पगलिया हेल्लो हेल्लो चिल्लाई
लाल कपड़ो में
पागल हँसा और बोला
पेड़ के पीछे से झांक के
नदियाँ खेल रही है....
पहाड़ों से लड़ रही है...
पेड़ झूम रहे है
जब मैं निकला था सब ऐसे था
अब भी ऐसे ही है...
पर वो खेल रही है इनके नियमों पे
लड़ती है पहाड़ो से कि
वो चुप खड़े क्यों है
पेड़ झूम झूम रोता है हर दिन
पगलिया रोने लगी... क्यों गया छोड़ के
वो लाल कपडे माटी में
लहरा के बोला
मैं जाता हूँ
आऊंगा फिर से मैं....
अब हरा जामा सिलवाउंगा...
तेरे लिए भी लाऊंगा
फिर ये हमे पागल पगलिया नहीं कहेंगे
रंग देख... तुझे ये 'मदर नेचर' का अंग कहेंगे
दोनों हसते रहे....फिर रोने लगे.... 


Saturday, 23 July 2016

डायरी


मैंने तुझे क्या छोड़ा
पूरी दुनिया ही राज़दार हो गयी

पनघट पे जो राधा गयी
सारी गोपियाँ बदनाम हो गयी
कान्हा ने तो माखन चखने को
रोका था सुन्दर नैनो वाली को
पर क्या करे, जो,
कमबख्त कांकरिया ही
मटकी पे ना, कमरिया पे वार कर गयी।

तू तो सुन के समझ के
चुपचाप साथ रहती थी
जब चाहा पढ़ा
उस हर बार तू निखरती थी

तेरा दामन क्या छोड़ा
पूरी चूनर ही दागदार हो गयी।

ये राज़दार दुनिया आज खोखली बातों को भी मोहताज हो गयी।





Saturday, 4 June 2016

Cliche

When life moves
from handloom to powerloom
affected my morning to night
sorrow to delight
pocket to suitcase
time to paper weight
'Talking' to message text
mother to baby sit
father to just a man to fit
society as a bark
handloom goes out
fading muslin, higher of linen
keeping hard for 'Indians' to survive
something mechanical
absolutely equal in time and price
'Power'loom is far from
Cliche of 'hand'loom, O Lord!

Thursday, 26 May 2016

पहली जनवरी

नए साल का नया दिवस
पहली जनवरी की सुबह सुहस
एक बैरक में बंद
दो आँखे झांक रही थी
कोई मिलने आया
ये संदेसा सुनने को ताक रही थी
रात में कोड़ो की बारिश थी शायद
बगल वाले बैरक में
मुस्कराहट कराह रही थी
कहते है पांच क़त्ल किया है
अपने बाप की मौत का बदला लिया है
जेल की सलाखों से
दो आँखे मैदान झाँक रही थी।

उसने देखा कदमो की
आलसी कदम ताल
जैसे अंधेरो में
उंगलियो का तुरपाई पे हाल
उसके पैरो की हलचल
काँपना बता रही थी
आँखे पैरो से तेज़ भाग रही थी
कोई आया है
ये संदेसा सुनने तो ताक रही थी।

एक बच्ची झोला टाँगे
बाहर नीले गेट पे
जेल के बड़े गेट पे
घर के लड्डू में ज़हर
नपवा रही थी
कोई आया है
यर सुन पैरो से तेज़
अंखिया भाग रही थी
"बिटिया आई है
रोना नही है"
"पापा आएंगे
रोना नही है"
दोनों ही अंखिया
ओस में डूबी दूब सी
मुस्कुरा रही है
दिल की धक् धक्
ऊ तेज़ उड़ती चिड़िया सी
दौड़ रही है
नया साल अच्छा हो
ऐसे बोल बिटिया पापा को
इक मीठी गुझिया खिला रही है
अच्छे नंबर लाना
खाकी वर्दी
बिटिया को सीख सिख रही है।
जाते जाते फिर से पूछ पड़ा कोई
कानूनी कागज़ तो नही पर
उनकी बतियाँ
पापा को बिना मुक़दमे
कातिल बता रही है
ये जेल की सलाखें
उनको एक मुजरिम बना रही है।





Sunday, 8 May 2016

माँ क्या है न कि कौन है?

माँ... ये शब्द खुद में एक संसार समेटे हुए है। एक लड़की एक औरत बनती है उम्र में बड़े होते हुए और एक पड़ाव पर माँ बनती है। लड़की से औरत होना उसकी उम्र या उसके विवाह से जोडा जा सकता है। पर एक लड़की या औरत का माँ बनना उसके अपने बच्चे से तय होता है। एक बच्चे का इस दुनिया में आना एक पूरी तय प्रोसेस है जिससे गुजरना होता है एक औरत को माँ बन्ने के लिए। पर मातृत्व का एहसास बिना किसी प्रॉसेस के भी हासिल किया जा सकता है। इसमें भी कुछ नियम कुछ कानून है। माँ असीम प्रेम करती है अपने बच्चे से। पर ये माँ का प्यार भी समाज की जंजीरो से बंधा हुआ है। शादी विवाह कर के अपने पति के साथ स्थापित संबन्ध के परिणामस्वरूप विकसित नया जीवन औरत को माँ और एक आदमी को पिता का दर्जा देता है।
माफ़ी चाहूंगी मैं थोडा इधर उधर जा सकती हूँ बातों में पर मुद्दा यही रहेगा इसी से जुड़ा हुआ। एक बात गौर तलब है  यदि यही बच्चा बनाये नियम सलीको से न हो तो बच्चा गैर कानूनी कहलाता है, नाजायज़ कहलाता है। नियम कानून तो उन दो आदमी औरत ने नही माने  फिर बच्चे पर तोहमद क्यों? वो फिर भी माँ बाप ही रहते है। ऐसे केस में बाप भी बच जाता है। माँ बनी औरत ही ताने सुनती है। 
तरीका वही होता है पर माँ की ममता को वो स्थान नही दिया जाता। बच्चा वैसे भी पैदा हो के दुनिया में पलता बढ़ता है पर उसे नार्मल तरीके से जीने नही मिलता। जीने नही दिया जाता। उसके लिए माँ की परिभाषा कुछ अन्य विशेषण के साथ समझायी जाती है। हमारे लिए जो सामाजिक तौर पे जायज़ है माँ और बच्चे उनके लिए माँ देवी है। पर वो जो इससे बाहर है उनके लिए ये इतना सुखद अनुभव नही हो पाता शायद। 
इसे क्या कहा जाये माँ की ममता का नाप तोल उसकी अपनी ममता से केवल नही बल्कि अन्य बहुत से पक्ष को ध्यान में रख के किया जाता है। माँ तो किसी भी चीज़ की मोहताज़ नही अपने बच्चे को प्यार करने के लियें पर मैंने न जाने कितनी बार इन माँओं को और इनकी ममता को घुटते देखा है। 
इस देवी को हारते देखा है। हमने बना तो दिया एक इंसान को देवी पर उसकी शक्ति उसके हाथ नही छोड़ी। मोथेर्स डे आते ही सोशल मीडिया पे बहुतेरे वीडियो, मेसेज आने लगे। डी पी बदलने लगी रात के बारह बजे के बाद। ऑनलाइन शौपिंग वालो के ऑफर्स पिछले हफ्ते से ही मोबाइल स्क्रीन पे पॉप अप करने लगे। वर्ना मुझे पता भी न चलता की 8 तारिख को क्या है? वीडियोस बताते है कि आपने कितने दिन से अपनी माँ से बात नही की। और वो आपके दादा बन कर आपको याद दिलाते है कि अपनी माँ से प्यार कर लो।
 माँ आज जब घर से बहार निकल कर काम करने वाली महत्वाकांक्षी औरत बन गयी है तब भी क्या उसकी ममता वैसी ही बरकार है। सुरक्षित है हमारे बीच। नही। समाज ने उसे बदला। समय के साथ उसके स्वरुप को बदला। और जब भी औरत थोडा सा भी उस दायरे से बहार गयी तो उसकी मातृत्व को भी प्रश्न किया। जैसे मोदी सरकार आज कल कुछ भी बोलती है तो लोग झट से पूछने लगे है कि दो साल क्या किया है पहले वो बताओ। वैसे ही एक माँ की सफलता उसकी ममता का एक ही हिसाब है की उसके बच्चे ने क्या किया पहले ये बताओ। वो कैसे बताये भला? जब वो छोटा सा बच्चा था तब वो माँ के साये से लिपटा रहता था। जब बड़ा होने लगा तो दुनिया में बाहर निकला जहाँ उसकी माँ को ही बहुत जाने नहीं मिला। ये उसके पिता का एरिया था असल में। वो जब जब वहां बिगड़ा माँ पे इल्जाम आया। और एक समय बाद वो इतना बाहर चला गया की सोशल मीडिया को याद दिलाना पड़ता है माँ के लिए कुछ करने को। उनसे बात करने उनके साथ खाना खाने के लिए। माँ का रोल है ही क्या फिर। बस डाइपर और स्कूल तक। और अगर माँ ने समाज के नियम नही माने और अकेले ही एक बच्चे की ज़िम्मेदारी ली तो उसकी मातृत्व पे सवाल कोई क्यों उठाता है। 
उसकी ममता निश्छल है तो मत बांधो जंज़ीरों में। और नही है तो उसे देवी बना सारा बोझ उस पर मत डालो। माँ.. मैं बड़ी हुई मेरी गलती का सबब मेरी माँ को भुगतना पड़ता है और मेरी हर सफलता की गुहार लगाने का जिम्मा मेरे पापा को जाता है। मेरी माँ एक कोने में मुस्कुरा के तसल्ली ले लेती है तब। ज़रूरी नही हर माँ ऐसी हो। कही कही पापा ऐसे होते है और माँ पापा जैसी होती है। वहां किसे क्या कहा जाये। एक सिंगल मदर को क्यों कम आँका जाये। माँ की ममता क्यों ही नापी जाये। हम अक्सर नापते  है। और हर बार उसकी ममता को सवालिया नज़रो से देख जाते जाने अंजाने में। 
माँ एक एहसास है एक इंसान नही। बदलते परिवेश में थोडा हम भी अपनी माँ को बदलता हुए देखे और खुद थोडा उनसे और नरमी से पेश आये। अपने किसी को प्यार करना और उसके गुस्सा के बावजूद सिर्फ उसी का ध्यान रखना बेहद मुश्किल होता है। और इसे माँ के बारे में बताने के लिए बिशेषता के लिए कुछ वाक्यो का गुच्छा कहे तो ज़्यादा नही होगा। माँ को परिभाषित करने के बजाय अगर सिर्फ एहसास करे तो वो सच मानिये हर दिन ख़ुशी से सोयेगी और माँ होने पर फक्र करेगी। 
मैं आजकल अपने आस पास कई सारी नयी मम्मीओ को देख रही हूँ। माँ की ममता सच मानिये किसी परिभाषा से नही चलती वो बस वो औरत होती है जो अपने जनी हुई जान को ज़िंदा रखना चाहती है एक इंसान जैसा। बस इसके आगे सब सामाजिक राजनितिक आर्थिक धार्मिक है माँ की ममता बस एहसास है। 
आप सभी को जो माँ बन चुकी है और जिनमे मातृत्व की भावना हो चाहे आदमी हो या औरत सभी को इस दिन की बधाई। 

Thursday, 5 May 2016

आखिरी बार एक मुलाकात


तोड़ दो सरे बंधन
खुद से नाराज़ हो लो
सिसकियों को तिजोरी में
रख छोड़ आओ
हँसी बाँध दो पेड़ की डाल में
कहना सबकुछ छिपा दो
एक अखबार में
लपेट लो अपनी अकड़न
टांग दो कही खूंटी में
छोड़ आना वो पिछला चिल्लाना भी
सब से पहले इस फ़ोन को
बंद कर आना अलमारी में
और रख आना कही वो
भागना मुझसे भी
हो सके तो ले आना
पहली मुलाकात की मुस्कराहट
मेरा सर सहलाना
और वो मन्मार्जियां गाना भी
वो रात की एक आहट
जो दबे पाँव थी आई
बुला लेना उसे भी
भरे दिन बाजार में
कई सारे नामो को
न्योता दिया है
तुम भी बुला लेना
जो मुझको बुला लेते थे यूँ आते जाते
कइयों का पता याद नही मुझको भी
अच्छा सुनो
कुछ गुस्सा चिढ भी उठा लाना
चुपके से
पूरा आ गए तो
मैं फिर कुछ न कह पाऊँगी
ले आना वो
सुबह में मुझे एक टक देखना
उन होठो आँखों की पोटली भी ले आना तुम
हाथ पकड़ने की कोशिश
भी आ जाने दो
और क्या क्या बताऊ
क्या ले आओगे
जो मिले न मिले सब समेटे आना तुम
कल की तारीख
तुम याद रख लेना बस
और खुद भी चले आना जी
कहते है,
जाने वाले को आखिरी सलाम पेश करना कल्चर का हिस्सा है अपने।
इन सब को ले के
चले आना तुम
एक बार देख के जाना तुम
पिछली कई दफे से आँखों तक नज़रे पहुच नही पायी तुम्हारी
इस बार मेरी आँखों पे नज़रे लगा जाना तुम
एक आखिरी सलाम ले जाना तुम
वो चाभी का छल्ला
वो कमरे का कोना
मेरी वो जगह
वो बाँहों का सिरहना
न देना इन्हें अब
किसी और को
गर देना तो
धुल के मिटा देना मुझको
मेरी यादों का पसीना
बड़ा दागदार है।
कहते है,
जाने वाले को उसकी पसंद का सामान
दे देते है
उसके संग जाने देते है
तुम मुझे मेरा प्यार
मेरे सपने
हँसी
वो कंधे की तकिया मेरी
वो मालिश का हिस्सा मेरा
बिन कहे सब समझने का किस्सा तेरा
तेरा रूठना
मान जाना मेरा
रूठते रूठते आज यूँ ये जाना तेरा
हारना और हार के टूट जाना मेरा
सब छोड जाना यही
मुझ संग जाने को
मैं सबसे प्यारी मुहबत
दान करती हूँ
तुझे इस दुनिया के हवाले करती हूँ।
बस तू ये दिन याद करना
एक बार मुझे देखने
आना ज़रूर ।


Sunday, 17 April 2016

Love Shots

Women's Studies makes you think about yourself and society

Women's Studies makes you think about yourself and society: Dr. Lakshmi Lingam is the Deputy Director of the Centre for Women's Studies, School of Social Sciences, Tata Institute of Social Sciences. Dr. Lakshmi did her PhD from IIT Bombay.

There are many friends who know very little about the subject Women's Studies. I consider their prejudices and disagreements with the subject as it is about 'Women'. why do i consider? because they are not aware of working area of the subject. Here is the thing, a note by a recognized person. So, spare some time and thoda gyan badhaiye....kya kijiyega janaab aaj kal bina auraton ke kaam nhi chalna. yes, i am talking officially and taking it professionally. Enjoy!

Saturday, 16 April 2016

धरती के सौतेले













ज़मी सूखी है,
मर रहा किसान है।
पानी कम है,
भूखा गुलाम है।
पानी देते इंद्र देव बने
टैंकर वाले
कनस्तर भरता पानी से 
जेबे भरते नोटों से
दोनों ही इसी माँ की संतान है।
ये ज़िन्दगी ऐसे क्यों बेहाल है।

एक कवि कहता
आस्मां हो गया क्या बेवफा
निकली ज़मी की जान है
आग उगले जा रहा 
ऐसी भी क्या बेरुखी सवार है
सूरज जल जल इसे जलाये है
धरती गुस्से से काँप जाये है
हर दिन अब आता भूकंप भरमार है

गलती किसकी है 
सुलटा लो जल्दी भाई
तुम दो के चक्कर में
फ़सी हमारी जान है।

कवि कितना पागल है
सोचे ये झगड़ा उनका है
जो खुद मर रहे हमारे तांडव से
मांगे उनसे अपने प्राण है। 
कोई समझाए जो इसको
गर हम इतने भोले होते
पेड़ न कटे होते इतने
पानी पानी सा न बहाया होता
सब छोडो, इतना बस देखो
आज जब मरते हमारे आधे जन
फिर भी
हम IPL से कमा रहे पहचान है।
कहते हम जनतंत्र है
जिसको पानी चाहिए 
वो जाये
हम तो अभी ग्रीन पिच कवर्ड
इंडिया की शान है। 
हमको ज़िन्दगी जीने का
सेक्युलर अधिकार है।

हर घर में नल
अंदर भी बाहर भी
ऐसी इनकी मांग है
आर ओ किनले रहीश हो रहे
बस पानी मिल जाये
कुछ की इतनी सी ही डिमांड है।
कवि तू क्यों माटी और आस्मां को
घूरे जाता
वो तो अलग हुए है
क्योंकि धरती पर
उसके सौतेलो का राज़ है।




Friday, 8 April 2016

सबसे बुरी बात थी हमारे बीच की
हम हमेशा 'मैं' और 'तुम' थे..
कभी भी 'हम' नहीं बन पाये
तुम हमेशा ' मैं' चाहते थे...'हम' नहीं
और मैं 'हम' में 'मैं' और 'तुम' खोजना चाहती थी।

सच है जब जब रोइ तेरे लिए तड़प के
तुझे पाने की चाहत में,
हर बार थोड़ी सी मरती गयी
आज ज़िंदा हूँ
पर 'देसी' कब चली गयी
तुझे पता ही नही चला
'गम्मो' को तू कब भूल गया
तुझे याद ही नहीं।

भागती रही कुछ पाने को
जो था मैं सब खोती रही
हारती रही
'तू' 'वो' सब कुछ चाहते थे
मैं भी चाहती थी कुछ
तेरी चाहत पाने में मैं अपना खोती रही
किसी को पता भी नहीं चला।

वहां आसमान में मेरा कुछ नही छूटा
मैं तो यही ज़मी में दफ़न होती रही।
आज खुद से रोकर चुप होने का हुनर सीख लिया
माँ का आँचल और तेरा सीने लगा कर दुलारना
पापा की थपकी, दीदी का सम्भलना
भाई का सर पकड़ के सब समझा देना
और खुद का इंसान होना
सब याद बनते देखती रही।

शायद मैं इस दुनिया के लायक नही
ज़्यादा प्यार चाहती हूँ।
अब खुद से बात कर के सवाल पूछ
जवाब चाहती हूँ।
ये सिलसिला कब शुरू हुआ
मुझे भी पता नही चला।

दर्द

फ़िलहाल में,  दर्द के बारे में एक बार जानी है  दर्द जब होता है तब ही तकलीफ़ होती है  चिल्कन, तड़पना, जलन, घबराहट, साँसों का चढ़ना चमड़ी और उ...