मैं एक सरकारी नौकरी में हूँ, सैलरी आती है महीने की शुरुआत में। शादीशुदा हूँ और एक ईश्वर और समाज से डरने वाले और सामाजिक दायरों में रहने वाले परिवार से जुड़ी हूँ। तो कहा जा सकता है कि मैं अच्छे परिवार से जुड़ी हूँ और उसका हिस्सा हूँ। सामाजिक मापदंडों पर मैं एक सफल व्यक्ति/ महिला कही जाती हूँ। लगभग सभी टिक मार्क कर के जीवन के इस पड़ाव में अगले स्टेप की तरफ़ बढ़ने की माँग लगभग हर दिन सुनती और जानती हूँ। इस सवाल से ख़ास परिचय है कि अब बच्चा कर लो। उम्र बढ़ती जा रही हूँ। ये भी ज़रूरी है आदि आदि।
मैं जब सोचती हूँ इस बारे में तो मैं बहुत निराशावादी प्रतीत होती हूँ। मेरे आस पास ऐसा कुछ नहीं हो रहा जिससे उम्मीद जगा कर मैं एक नई जान को इस दुनिया में लाने का ज़रिया बनूँ या बनने की हिम्मत करूँ!
सरकार और सरकार में चुने लोग, सरकार को चुनने वाले लोग, धर्म के नाम पर राजनीति और लूट करने वाले लोग, रेप को गलती बताने वाले, डेटा को घुमा के सही बताने वाले लोग, झूठ को नया चेहरे दे कर ख़ुद को सच का देवता मानने वाले लोग, देश नहीं नेता को भगवान मानने वाले लोग, औरतों को देवी बता घर में जलाने वाले लोग, अमीरी गरीबी में बांट अपना घर बनाने वाले लोग…. इन लोगों के बीच मैं कैसे किसी नन्ही जान को धकेल दूँ। जो दूसरों का घर जलने पर ख़ुश होने वाले कभी क़ैसे सही हो सकते हैं? मैं इतनी निराश हूँ कि जिस तरह मैंने पूजा करनी छोड़ी वैसे ही मैंने करंट अफेयर्स जानना छोड़ दिया। बता दूँ कि मेरा दोनों से ख़ास रिश्ता रहा था दस साल पहले तक। भरोसा टूटते टूटते डैम तोड़ता है। पहले भगवान की पूजा करना कम होता गया और धुंधला गया और धीरे धीरे लोगो की ज़ुबान नियत और समझ पर धार्मिक प्रपंच का पर्दा ऐसा पड़ते देखा जो इंसानियत को ही खा गया। तो सब कुछ पढ़ना देखना समझना छोड़ दिया। डर और ख़ुद से कुछ ना कर पाने का दर्द निराशा की तरफ़ मोड़ गया मन को। शर्म आती है ख़ुद पर हर दिन। कुछ ना करने की फिर एक दवाई को तरह इस बात के सहारे जी लेती हूँ कि मैं अपने दायरे में न्यूनतम कोशिश ठीक नियत से कर रही हूँ। बस इतनी सी बात ज़िंदा रहने में कारगर है।
इस निराशा में, एक दिन कुछ युवा किसी ऐसे ही ज्ञानवादी व्यक्ति की बात से आहत हो तय करते हैं कि अपने लिए सवाल उठायेंगे। वो उम्मीद हार गए अपने बड़ों से और उम्मीद हार गए अपने बड़ों द्वारा चुने नेता और भगवान नुमा एक अदद नेता, बाबा और बड़बोले लोगों से। वो ख़ुद उतरते हैं। जंतर मंतर पर सिमटते जगह को चौड़ा करने। अपनी बैठी आवाज़ से सबको जगाने। साथ देने एक दूसरे का। इस बहरी मुर्दा क़ौम को जगाने का जो युवा के भविष्य को ताक पर रख झूठे दावे करते ना थकती है और ना ही शर्म में डूब मरती है। मुझसे नहीं लिखी जा रही सब बातें… दुःस्वप्न है जिसे मैं याद कर लिखना भी नहीं चाहती। बस शायद मैं प्रत्यक्ष आहत नहीं इसलिए आसानी से जी रही थी।
अब एक उम्मीद जगी है… कि अगर कुछ अच्छा ना हुआ तो ये युवा हमारी तरह मुर्दा, डरे हुए और ख़ौफ़ज़दा लोग नहीं है। ये नए बच्चे और युवा इस जमात के नहीं। अब अगर मैं ज़रिया बनी एक नई जान का इस दुनिया में आने का तो उसके पास लड़ने, बोलने और अपने अधिकार के लिए आवाज़ उठाने को एक सरकास्टिक क़रार का सच सामने है… जंतर मंतर से अपने पढ़ाई और भविष्य के लिए लड़ते वो ख़ुद। और फेल हुए पीढ़ी को आईना दिखाते कि मत डरो तुम। हमसे सीखो कि कैसे अपनी ज़िंदगी की कमान ख़ुद संभालेंगे। और बतायेंगे उन्हें तुमको नेता चुना है अपनी ज़िंदगी और देश गिरवी में नहीं दे दिया है।
बात हार जीत की नहीं लड़ने की है। जो हम डरपोक लोगों ने छोड़ दिया था। सिर झुकाए व्यवस्था को गाली देते, अपने हाथों अपने बच्चों का भविष्य कुचलते शान से खड़े हो भारत महान के दावों को ऊँचा कर रहे हैं।घृणा और संताप में एक उम्मीद की किरण जगी है जंतर मंतर पर। तुम उन नेता, प्रसिद्ध लोगों को नकारो जो तुम्हारे मुद्दें नहीं उठाते और हम डरपोक को जगाओ और डराओ की हम ज़ुर्रत ना कर सके तुम्हारे भविष्य से खिलवाड़ करने की।
मुझे गर्व है कि मैं तुम्हें देख सकती हूँ और तुम मुझे सुना और दिखा पा रहे हो। आवाज़ और उम्मीद!
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