मेरे पास हर टुकड़े पर उसे पूरा करने की खता करने वाला एक शख़्स मौजूद था
मौशिक़ी हो या हिमाक़त
शिक़वा हो गया माज़रत
हसना हो सखियों संग
या रात बैठ चाँद ताको
सुबह सुबह चाय पर मुलाक़ात
बचपन के किस्से में रोना और हँसना
या हो कोई सलाह लेनी
हमपसंद का साथ
या हमराज़ से गुफ़्तगू
दोस्ती की नई चाल
या पुरानी आदत जैसे दोस्त
साथ या सवाल
उलझन या ख़ौफ़
यादें या मोहब्बत
ख़्वाब या मेहनत
लकीरें या तरीक़े
साहिल या जंगल
पानी या रेत
सब थे संग मेरे
अपने अपने टुकड़े में
अपने हिस्से का खाना डालते
वहीं, उसके पास कोई ना था
ऐसा बताया और लगा भी सही
मैं अकेली थी
सब झूठे साथी
मैं पक्की सखी
अब जब थम के देखा आज
तो आज पासा पलट गया
चक्र चला और मैं
मैं खड़ी हूँ अब अकेली
अब मेरे टुकड़े नदारद
कहीं पोटली बंद
उसके सिवा कोई नहीं
वो एक और मैं एक
उसके पास कहते कहते
हर मंजर पर नज़र रख
एक एक सिपाहीनुमा दोस्त
रखवाली करने बैठे है।
साथ है उसके वो
कुछ ख़ास
कुछ अपने
कुछ मन पसंद
कुछ लोग बस लोग
मैं चुप हो गई
चुप शांत नहीं
मेरे टुकड़े खोजती
ना खोजती
कहीं गुम
कहीं खुली
बस हूँ।
किसी दिन बरसूँगी
चीखें तुम नहीं सुन पाओगे।
याद रखना
ये मेरे टुकड़ों के टूटने की चीख
या उसक डर या दर्द की चीख नहीं
उसे किसी ने देखा ही नहीं
जाना ही नहीं
बस उसने जिससे टूटी
उसने जो टूटा
मैं जो बिखरी, तराशी जा रही हूँ।
मैंने मोहब्बत की भाषा परिभाषा को ग़लत समझते देखा। इतनी बुरी समझ में मैं दुनिया के लिए समझदार कैसे हो गई। या तो ज़िंदा ना रहूँ या इश्क़ समझ लूँ…. ख़ुद से और तुझसे मेरे खुदा।
4 comments:
मार्मिक अभिव्यक्ति।
सादर।
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नमस्ते,
आपकी लिखी रचना रविवार १५ दिसम्बर २०२५ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
बहुत सुंदर
सुंदर लेखन
रहनुमाई में भी एक रहनुमा है...चंद लकीरें क्या जानें... उस वक्त का तेजाब..जो आबे जम जम से भी तेज था...
दुलारा..था..
भोला था..
पर पेश हुआ ऐसे...जैसे वो ही नक्कारा था...
शिव शंभू...भी कहां धारण करेंगे
वो ज़हर जिसे इतनी आसानी से सीने में उतारा था...
खुश तो हो नहीं सकते...
चीखें ही आयेंगी...
कहां ..कब यही अब सोच सकते...
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