Saturday, 13 December 2025

 

मेरे पास हर टुकड़े पर उसे पूरा करने की खता करने वाला एक शख़्स मौजूद था  

मौशिक़ी हो या हिमाक़त 

शिक़वा हो गया माज़रत 

हसना हो सखियों संग 

या रात बैठ चाँद ताको 

सुबह सुबह चाय पर मुलाक़ात 

बचपन के किस्से में रोना और हँसना 

या हो कोई सलाह लेनी 

हमपसंद का साथ 

या हमराज़ से गुफ़्तगू 

दोस्ती की नई चाल

या पुरानी आदत जैसे दोस्त 

साथ या सवाल

उलझन या ख़ौफ़ 

यादें या मोहब्बत 

ख़्वाब या मेहनत 

लकीरें या तरीक़े 

साहिल या जंगल 

पानी या रेत 

सब थे संग मेरे 

अपने अपने टुकड़े में

अपने हिस्से का खाना डालते 


वहीं, उसके पास कोई ना था 

ऐसा बताया और लगा भी सही 

मैं अकेली थी 

सब झूठे साथी 

मैं पक्की सखी 

अब जब थम के देखा आज

तो आज पासा पलट गया 

चक्र चला और मैं 

मैं खड़ी हूँ अब अकेली 

अब मेरे टुकड़े नदारद 

कहीं पोटली बंद 

उसके सिवा कोई नहीं 

वो एक और मैं एक 

उसके पास कहते कहते 

हर मंजर पर नज़र रख 

एक एक सिपाहीनुमा दोस्त 

रखवाली करने बैठे है।

साथ है उसके वो 

कुछ ख़ास 

कुछ अपने 

कुछ मन पसंद 

कुछ लोग बस लोग 

मैं चुप हो गई

चुप शांत नहीं 

मेरे टुकड़े खोजती 

ना खोजती 

कहीं गुम 

कहीं खुली 

बस हूँ। 

किसी दिन बरसूँगी 

चीखें तुम नहीं सुन पाओगे। 

याद रखना 

ये मेरे टुकड़ों के टूटने की चीख 

या उसक डर या दर्द की चीख नहीं 

उसे किसी ने देखा ही नहीं 

जाना ही नहीं 

बस उसने जिससे टूटी 

उसने जो टूटा 

मैं जो बिखरी, तराशी जा रही हूँ। 


मैंने मोहब्बत की भाषा परिभाषा को ग़लत समझते देखा। इतनी बुरी समझ में मैं दुनिया के लिए समझदार कैसे हो गई। या तो ज़िंदा ना रहूँ या इश्क़ समझ लूँ…. ख़ुद से और तुझसे मेरे खुदा। 

4 comments:

Sweta sinha said...

मार्मिक अभिव्यक्ति।
सादर।
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नमस्ते,
आपकी लिखी रचना रविवार १५ दिसम्बर २०२५ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।

हरीश कुमार said...

बहुत सुंदर

सुशील कुमार जोशी said...

सुंदर लेखन

Anonymous said...

रहनुमाई में भी एक रहनुमा है...चंद लकीरें क्या जानें... उस वक्त का तेजाब..जो आबे जम जम से भी तेज था...
दुलारा..था..
भोला था..
पर पेश हुआ ऐसे...जैसे वो ही नक्कारा था...
शिव शंभू...भी कहां धारण करेंगे
वो ज़हर जिसे इतनी आसानी से सीने में उतारा था...
खुश तो हो नहीं सकते...
चीखें ही आयेंगी...
कहां ..कब यही अब सोच सकते...

  मेरे पास हर टुकड़े पर उसे पूरा करने की खता करने वाला एक शख़्स मौजूद था    मौशिक़ी हो या हिमाक़त  शिक़वा हो गया माज़रत  हसना हो सखियों संग ...