मैं हर वक़्त झूठ बोलती हूँ
किसी को नही खबर
मैजे कब सच बोलती हूँ
न जाने क्यूं उन्हें शौक है
मुझे समझ पाने का
में उनकी हर समझ पे
एक नया झूठ सींचती हूँ
उन्हें दिक्कत है
मेरे फक्र और स्वार्थ पर
में उनके हर संजीदा सवाल पे
खुला घाव समझ
एक नया झूठ छिड़कती हूँ
वो है हैरान
बदल गयी है ये बहुत
कुछ ने दिलचस्पी बढ़ा दी ज़्यादा
में खुद को अकेला कर
सबसे अपने खुशी का
खुशनुमा झूठ बोलती हूँ
जो कहते है मुझे समझते है
मेरे साथ हर पल खड़े होते है
वो सबसे ज़्यादा मुझे नफरत करते है
प्यार का मुखौटा पहन
सब सच समझते है
में उनसे भी हर दफे झूठ कहती हूँ
इस झूठ का सच क्या है
उस सच को भी एक नया झूठ समझती हूं
- में आज कल हर पल नया झूठ बदलती हु।
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