बोल, कि लब आज़ाद हैं तेरे...

दिल्ली विश्वविद्यालय में बीते दिनों डरने डराने के किस्से ने फिर से कुछ नई आवाज़ों को जनम दे दिया। ये जितना अब डराते है ये उतना बोलती है। मज़े की बात ये है कि ये पहले भी डरते थे इसलिए दबा के छुपा के रखते थे और आज भी डरते है इसलिए डराते है। गुलमेहर तो एक नाम है, न जाने कितनी आवाज़ें विश्वविद्यालय की सड़को पे कदम ताल कर रही है। न तो ये नारे वाली आवाज़ है, न धमकी वाली है और न ही गुर्रा रही है। ये बस प्यार से शांति से समझा रही है कि थोड़ा अब तुम भी सीख लो इज़्ज़त बचाना, नाक न कटवाना, सरेआम माँ बाप के साथ साथ देश की इज़्ज़त न लुटवाना। क्योंकि लड़कियां कहाँ देश की इज़्ज़त लुटवाती है? अभी पहुच ही नही पायी है वहां तक। अभी तो इनके बोलने पे ही हंगामा बरपा है। समझ नही आता, फिर डर के ये बाबू भइया लोग काहे आय बाय बकने लगते है। ये जैसे डरते है तभी,एकदम उसी वक़्त लड़की के चरित्र पे वार करने लगते है और बलात्कार करने के कार्यक्रम तक पहुच जाते है। इन स्पेशल लड़को अथवा समाज के इस वर्ग को महिलाओं से अत्यधिक प्रेम है पर कंफ्यूज है लगता है ये सब। या तो देवी समझते है या फिर दासी। खैर ये तो लंबी कहानी है इसे सलटाने में तो कहानी बन जायेगी हमारी आपकी। पर हां, इस एकजुट निडर आवाज़ों  ने ये ज़रूर कहा है कि अब ये बोलेंगी। एक साथ बोलेंगी। हक़ से बोलेंगी।
फैज़ अहमद फैज़ साहब की ये पंक्तियां कॉलेज की दिनों में ज़ुबां की तरफ से एक वर्कशॉप में सुनी थी। हिम्मत दे जाती है। ये हम सब के लिए जिनको बोलने की वाक़ई ज़रूरत है और खासकर हमारी बहनों के लिए।

Bol, ke lab azaad hai tere:
Bol, zabaan ab tak teri hai,
Tera sutwan jism hai tera –
Bol, ke jaan ab tak teri hai.

Dekh ke aahangar ki dukaan mein
Tund hai shu’le, surkh hai aahan,
Khulne-lage quflon ke dahane,
Phaila hare k zanjeer ka daaman.

Bol, ye thora waqt bahut hai,
Jism o zabaan ki maut se pahle;
Bol, ke sach zinda hai ab tak –
Bol, jo kuchh kahna hai kah-le!

बोल, कि लब आज़ाद हैं तेरे
बोल, ज़बां अब तक तेरी है
तेरा सुतवां जिस्म है तेरा
बोल, कि जाँ अब तक तेरी है
देख कि आहन-गर की दुकां में
तुन्द हैं शोले, सुर्ख हैं आहन
खुलने लगे कुफ्लों के दहाने
फैला हर इक ज़ंजीर का दामन
बोल, कि थोड़ा वक्त बहुत है
ज़िस्मों ज़ुबां की मौत से पहले
बोल, कि सच ज़िन्दा है अब तक
बोल, जो कुछ कहना है कह ले

The literal and poetic transliteration is below:

Speak up, while your lips (thoughts) are (still) free
speak up, (while) your tongue is still yours
Speak, for your strong body is your own
speak, (while) your soul is still yours
Look at blacksmiths shop
hot flames makes the iron red hot
opening the (jaws of) locks
every chain opens up and begins to break
speak for this brief time is long enough
before yours body and words die
speak, for the truth still prevails
speak up, say what you must.
                                                 

Comments

Amardeep Darade said…
Thats really nicely written...u made an important improvement by providing the crux and meaning of poem..awesome
Jamshed Azmi said…
बहुत ही सुंदर और प्रभावशाली रचना की प्रस्तुति। मुझे यह रचना बहुत पसंद आई। अच्छीै रचना के लिए धन्यवाद। मुझे इस रचना ने बहुत प्रभावित किया है। अच्‍छे और प्रभावी लेखन के लिए आपको बहुत बहुत बधाई।
Thank you Azmi sahab and Amardeep.